Wednesday, July 18, 2012

Tuesday, December 20, 2011

अदम गोंडवी .... गवार देहाती शायर का बेबाक निर्भीक अंदाज़।

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़लतियाँ बाबर की थीं, जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक़ वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ां
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त! मेरे मजहबी नग़्मात को मत छेड़िए

Wednesday, September 14, 2011

मोदी का उपवास ...क्या पाप धुल जायेगे ...
सियासत से अदब कि दोस्ती बेमेल लगती है
कभी देखा है पत्थरो पे भी कोई बेल लगती है
कोई भी अंदरूनी गन्दगी बाहर नहीं होती
हमे तो अब अदालत कि भी किडनी फेल लगती है

Saturday, August 27, 2011

लोकतंत्र की जीत का जश्न है ..खुशियाँ मनाइए


हमे आज़ाद भारत का युवा होने का आज गर्व हैं ..पहली बार देखी हमने लोकतंत्र में लोगो कि ताकत ..,सिर्फ राजनैतिक पार्टी के झंडो तले ही रैली नहीं निकलती, आन्दोलन ज़मीन पर जब उतरता है, तिरंगा कैसे ताकत का चिन्ह बन कर उभरता है, जब वन्दे मातरम के नारे सड्को पर दिन भर चिल्लाये जाते है तो तो दिल में कैसे तरंगे उठती है..बिना हिंसा के कैसे सरकार झुकती है, संसद क्यों संप्रभु है क्युकी वो जनता की है ...इसके लिए अन्ना जी का धन्यवाद..

Saturday, August 20, 2011

बाँध ले कफ़न हर कोई और तैयार हो जाये हम दे रहे है पैगाम वो खबरदार हो जाये..

बाँध ले कफ़न हर कोई और तैयार हो जाये
हम दे रहे है पैगाम वो खबरदार हो जाये
ज़ुल्म सहते सहते बूढी हो गई कितनी नसल
तय किया है जो हो फैसला इस बार हो जाये
एक आंधी ने जगा दी नई सुबह कि रौशनी
जला देंगे इतने दिए ख़त्म अन्धकार हो जाये
जो समझकर खुद को बठे है खुदा इस मुल्क का
अब दिखायेगे ऐसी हकीकत वो शर्मसार हो जाये
आज हम कर देंगे इतना तेज़ इस आवाज़ को
बहरी हमारी हुकूमत सुनने को तैयार हो जाये

Wednesday, August 17, 2011

कुछ कविताये हमेशा प्रासंगिक होती है..नागार्जुन बाबा की कलम बोल रही है

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती ,
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती ,
गद्दारी , लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती .
बैठे बिठाये पकडे जाना बुरा तो है ,
सहमी सी चुप मै जकड़े जाना बुरा तो है ,
पर सबसे खतरनाक नहीं होती .
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना ,
न होना तड़प का , सब कुछ सहन कर जाना ,
घर से निकलना काम पर , और काम से लौटकर घर आना ,
सबसे खतरनाक होता है ,
हमारे सपनो का मर जाना .

Sunday, August 14, 2011

आजादी की तहे दिल से मुबारकबाद ....इकबाल कि कलम से

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी

जिंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी

हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की जीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की जीनत

जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब

इल्म की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्दमंदों से ज़ईफों से मोहब्बत कराना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको

Wednesday, March 23, 2011

आज velentine डे नहीं पर कुछ है ....

हवा में मह्केकी मेरे ख्याल की खुशबू
ये मुश्ते खात है फानी रहे रहे न रहे ...
ये पंक्तियाँ जिसने लिखी वो २३ साल का नौजवान लड़का अपनी आँखों में आज़ाद , शोषण से मुक्त और सफलता की ओअर बढ़ते हुए हिन्दुस्तान का सपना लिए मौत की दहलीज़ पर खड़ा था, उसने शायद कभी choclate डे, फ्रेंशिप डे , velentine डे और किस डे नहीं मनाया पर उसने अपनी ही मौत का जश्न ज़रूर मनाया था, उसने और उसके साथ शहीद होने वाले उसके साथियों ने एक रास्ता तैयार किया था कल के हिन्दुस्तान की प्रगति और आजादी का. आज हम modern हो गए है पर हमने आज भी उतनी किताबें तो नहीं पढ़ी होगी जो उसने २३ बरस की उम्र में चाट ली थी . हम ग्लोबल वर्ल्ड में रहते है बहुत सारे डे मनाते है पर आज भी एक दिन है .२३ मार्च १९३१ को भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव ने फ़ासी का फंदा गले में दाल लिया ताकि कल का हिन्दुस्तान ग़ुलामी और शोषण के फंदे से आज़ाद हो जाए.

हम आज व्यस्त है , सिर्फ खुद को सफल करने की एक दौड़ में भाग रहे है परबहुत सारे दिनों को मनाते मनाते कार्ड्स और टेडी गिफ्ट करते हुए हम आज का दिन भूल गए है पर अगर भूल से आपकी नज़र इस पोस्ट पर पड़े तो एक बार उन शहीदों को याद ज़रूर करियेगा क्युकी आज हिन्दुस्तान अपने शहीदों की याद में शहादत दिवस मनाता है शायद किसी तोहफे के तो नहीं पर हमारे चाँद पलों पर वो अपना हक रखते है जहाँ हम दिनरात अपने नेताओ को कोसते गालियाँ देते है तो हमारे राष्ट्रीय नायकों को भी हम अपनी स्मृतियों में जगह तो दे ही सकते है ...

Monday, February 15, 2010

अब तो चंद नोट मे ईमान बदल जाते है

सर्द रातों मे जो फलक ओढ़ के सो जाते है
ये वही लोग है जो आलिशान महल बनाते है
अमीरे शहर ने क्या उससे भी कर लिया सौदा
अब उसके मौसम भी बस ग़रीबो पे कहर ढाते है
कमेतीयाँ जिरह अदालते यू तो सब ठीक है मगर
क्या कानून से भी कभी मसले हल हो पाते है
असलियत भी दस्तावेजों मे दब गई अब तो
वरना कागजों पे तो सब काम ही हो जाते है
वो और लोग थे जो मर गए उसूलो पे
अब तो चंद नोट मे ईमान बदल जाते है

Monday, January 18, 2010

बासु... जाते जाते दिखा गए एक और ज्योति

ज्योति बासु चले गए पर जाते जाते अपना शारीर मेडिकल स्टुडेंट्स के शोध कार्यो हेतु दान कर उन्होंने समाज को एक नई ज्योति दिखाई कि हमारा बेजान शारीर मिट्टी में मिलने के बजाय दूसरो की बेहतर ज़िन्दगी के लिए काम आ सकता है। कामरेड बासु अपने उन सभी साथियो के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत है जो कामरेड होने का मतलब भी ठीक नहीं जान सके है । सच्चा कामरेड किस तरह अपनी हड्डियों को भी दुसरो के हित मे समर्पित कर सकता है , इसकी मिसाल है ज्योति बाबु। उनका जाना न सिर्फ वेस्ट बंगाल बल्कि पुरे देश के लिए घहरा आघात है , डीलरों के एस देश मे अब लीडरों का आकाल पड़ गया है , ऐसे समय ज्योति दा का जाना एक बड़ा शुन्य पैदा करता है। अपने जीवन को देश के लिए समर्पित करने वाले सच्चे कामरेड को मेरा लाल सलाम।

Wednesday, January 13, 2010

पर जो बीत गया है वो गुजरता ही नहीं


आज भी मुड के जब मै पीछे देखती हूँ कभी
तुम्हारे साथ ही गुजरे है वो पल जैसे अभी
जहाँ पे ज़िन्दगी नया रंग ले के आई है
अपने दामन में खुशियाँ समेट लाइ है
मैं जी रही हूँ हंस रही हूँ देखती हूँ तुम्हे
किसी भी ग़म ने जैसे कभी देखा न मुझे
ये है शाम ये जो दिन और ये जो रातें है
जहाँ है हम तुम और सिर्फ अपनी बातें है
कोई भी फिक्र नहीं न कोई परवाह हमे
ज़िन्दगी जैसे नई मिल गई तुम्हारे साथ हमे
पर वो ज़िन्दगी अब साथ मेरा छोड़ गई
बस ये याद और वो बात यहाँ छोड़ गई
ये सच है वो दिन पीछे रह गए है कहीं
पर जो बीत गया है वो गुजरता ही नहीं

Monday, January 11, 2010

कोई हंसती थी अक्सर तुम्हे देखकर




भूल जायेगे सब हम तुम्हे देखकर
तुम भी रह न सकोगे बिन हमे देखकर
हमने चाहा बहुत अब भुला दे तुम्हे
सो भी पाए कभी न तुम्हे भूलकर
अब तो कोई भी चेहरा न अच्छा लगे
क्या हुआ है हमे ये तुम्हे देखकर
जिन राहो पे हम तुम चले थे कभी
राहें पूछे कहाँ है तेरा हमसफ़र
लोग कहते है क्या हो गया है तुम्हे
उदास चेहरे मे तन्हा हमे देखकर
हममे कुछ बातहै तुमको अच्छी लगी
वरना लौटे हो तुम क्यों कसम तोड़कर
ये यकीं है की रो भी सकोगे न तुम
किसी गैर का होता हमे देखकर
हम रहे न रहे याद रखना सनम
कोई हंसती थी अक्सर तुम्हे देखकर

तुमने कैसे सब कुछ भूला दिया है


तेरे ग़म ने जीना सिखा दिया है
हमे अश्क पीना सिखा दिया है
तेरे साथ खुशियाँ बरस बरस रही थी
अब उन यादो ने हमको रूला दिया है
शक्ल उसकी है मगर वो नहीं है अब
तुमने यार मेरा गुमा दिया है
जिस हंसी पे तुम थे निसार हरदम
तुमने उसे ही हमसे जुदा किया है
अब तो बस तुम यहीं बता दो
तुमने कैसे सब कुछ भूला दिया है

Friday, December 25, 2009

ये ग़म ही तो हैं जो हमेशा वफादार रहे हैं


अब हर शख्स में उसको ही तलाश रहे हैं
जिसके साथ भी कभी हम उदास रहे हैं
ख़ुशी का लम्हा हो या हो ग़म का मौसम
हमारे हर जज़्बात में उसके ही एहसास रहे हैं
ग़मों से ज्यादा शिकायत नहीं रही हमको
ये ग़म ही तो हैं जो हमेशा वफादार रहे हैं
उसने मुडके न देखे कभी पैरो के निशां भी
तो कैसे कह दे की वो हमारे कभी यार रहे हैं
उलझनों से अब दिल को लगावट सी हो गई
वो और होंगे जो खुशियों के तलबगार रहे हैं



Tuesday, December 15, 2009

इम्तहानो के दिन


अरे जयादा गंभीर न हो हम ज़िन्दगी के इम्तहान की बात नहीं कर रहे है हम बात कर रहे है बस कॉलेज के इम्तहान की .वैसे तो इस वक़्त हमे पढना चाहिए क्युकी इम्तहान हमारे चल रहे है पर जब किताबे दिल मै बेचिनी ला दे वही किताबी बाते मन और दिमाग को परेशां कर दे तो बस लगता है बहुत हो गया बस अब पेपर हाथ मै आ जाये और हम उसे करके ख़त्म करें पर काश यही नजरिया ज़िन्दगी के इम्तहानों के लिए भी पैदा हो जाये की बस अब जो भी होना है वो हो जाये और हम उससे बहार निकल आये पर हम क्यों ज़िन्दगी मै इम्तहानों को टालते रहते है ..उनका सामना करने से घबराते है , जबकि पता है अगर आज हम इसे दूर भागयेगे तो कल ये ज़रूर हमारे सामने आएगा पर फिर भी जितना हो सके हम उससे बस बचना चाहते है। ज़िन्दगी हर कदम पर हमे गिरना , खड़े होना , चलना, झूझना सिखाती है फिर इसी ज़िन्दगी से क्यों इतनी शिकायते है हमें ? हम क्यों नहीं मुश्किलों को बस इसी तरह से लेते की ये भी एक समय के लिए है बस पूरी हिम्मत से हम इनका सामना कर तो बाद मै मिलने वाला परिणाम ज़रूर अच्छा होगा। हमेशा सब कुछ अपने आप ही अच्छा होने की चाह ही हमे इन इम्तहानों से डरा देती है ।
बरहाल हमारे पेपर तो बहुत जल्दी ही ख़त्म हो जायेगें और अगर हम यू ही ब्लॉग लिखते रहे तो फिर बाद मै ' रिजल्ट क्यों ख़राब आता है ' इस पर भी एक ब्लॉग लिखते नज़र आयेगे तो हम जा रहे है अपने इम्तहानो के बेहतर रिजल्ट के लिए तयारी करने और हां अगर आपकी ज़िन्दगी मै भी कोई इम्तहान चल रहा है तो बस अपनी पूरी हिम्मत से इसका सामना करिए इसे टालिए नहीं बल्कि जल्दी से जल्दी इसे ख़तम कर दीजिये यकीन मानिए ये बस एक निचित समय के लिए है और अगर आपकी तयारी ज़ोरदार होगी तो रिजल्ट ज़रूर आपके हक मै होगा।

आशा है आप सभी की शुभकामनाये हमारे साथ है और ज़िन्दगी के हर इम्तहान के लिए आप सभी को हमारी ढेरो शुभकामनाये ।

Wednesday, November 18, 2009

बाअदब लखनऊ बेअदब लखनऊ ...एक सफर


मुझसे सुबह-ओ- शाम शिकवा कर रहा है लखनऊ
देख तुझमे धीरे धीरे मर रहा है लखनऊ


आली वासी साहब की ये लाइने दर्द बयान करती है उन दिलो का जो बाअदब लखनऊ से बेअदब लखनऊ की चश्मदीद रहीहै। हमारा lucknow न जाने हममे मर गया खो गया या सो गया पर हा वो हमसे जुदा ज़रूर हो गया। दुआ तो यहीं है काश वो सोया हो ताकि दोबारा किसी आहट से जाग जाए और हम उस फिजा मै फ़िर से साँस ले सके जहाँ 'पहले आप वाला' लबोलहजा था । खफा होने और गाली देने का अंदाज़ भी आप से शुरू होकर आप पर ही ख़त्म होता था, मोहल्ले के किसी एक घर की तकलीफ पुरे मोहल्ले के लिया परेशानी का सबब होती थी, मदद का जज्बा यूँ था की पता पूछने भर से शख्स आपको आपके मकाम तक छोड़ने चल पड़ेगा , मामूली फेरी वाले भी अपना सामान यूँ खास नाज़-ओ-अंदाज़ मै बेचते थे 'लैला की उंगलियाँ है मजनू की पसलियाँ है जनाब ज़रा गौर करे क्या खूब कक्दीयाँ है' इसी लखनऊ पर फ़िदा हो शेख इमाम साहेब ने लखनऊ के नाम ये शेर नजर किया

गुल से रंगीतर है खारे लखनऊ , नशे से भी बेहतर है खुमारे लखनऊ
फ़िर रहे है गुल हजारे लखनऊ , है चमन हर जो गुज़ारे लखनऊ


वक्त बदला दौर बदला और साथ ही बदला लखनऊ, बदलाव तो कुदरत की फितरत है पर जिस बदशक्ल सूरत में लखनऊ हमारे सामने है वो बदलाव ख़ुद लखनऊ के मुस्तकबिल के लिए बेहतर नही है , ये वो ही लखनऊ है जो बटवारे के दंगो के बीच भी अपने नवाबो की सांझी विरासत को नहीं भुला था , पर जब इसी लखनऊ में इस्लाम के दो जानशीन इस्लाम का ही खून बहा रहे थे तो कैफ़ी साहेब की कलम कुछ यूँ चली -

अजाँ में बहते थे आंसू यहाँ लहू तो नहीं ये कोई और जगह होगी ये लखनऊ तो नहीं
यहाँ तो चलती है छुरियाँ ज़बान से पहले यहाँ मीर अनीस आरजू की गुफ्तगू तो नहीं


इस दौरान लगातार हमारी तहजीब का दामन हमारे हाथो से सरकता रहा । हमारी आपसी गुफ्तगू तहजीब के दायरे से बाहरनिकल आई, sashduta हमारे बीच घटी , हम ज्यादा से ज्यादा ख़ुद को 'मै' के दायरे में समटते चले गए , इंसानियत का दर्ज़ा हमारी निगाहों में ख़त्म हो गया । अमीनाबाद और हजरतगंज में भीड़ बढ़ी पर वो खुलूस और रौनक ख़त्म हो गई जिसकी तलाश में लखनऊ वहां सिमट आता था , तांगे और बग्घियाँ टेम्पो और बस के काले धुंए में खो गए , तमाम शोरो गुल और चकाचौध के बीच भी आज दिवाली में अब वो नूर नही है और ईद की मिठास में एक अजीब सी कडवाहट घुल गई है । जिस शामे अवध की धूम दुनिया भर में थी वो अवध की मरी हुई तहजीब पर मातम करती हुई मातम-ए- अवध में तब्दील हो गई ।

सबसे ज्यादा अफसोसनाक तो ये है की इसके बाद भी लखनऊ संजीदा नहीं हुआ हमारे मौजूदा हुक्मरानों ने भी लखनऊ को बचाने में कोई खास दिलचस्पी नईं दिखाई । वरना क्या आज जिस लखनऊ के नुक्कड़ो गलीयो में आए दिन बड़ी बड़ी राजनैतिक रैलियाँ निकलती रहती है उसके पास इतनी जगह मयस्सर नही है की वो अपना जश्ने लखनऊ ख़ुद लखनऊ के अन्दर समेट सके, इस जश्न में न लखनऊ की तहजीब है न ही हमारे फनकार और न लखनऊ का अहसास ,नवाबो के बेजान पुतले और इमारतो के ढाँचे खड़े कर देने भर से हम इसे जश्ने लखनऊ मान बैठेगे। जिस गोमती के किनारे ये पुरा शहर तामीर हुआ आज वही गोमती का किनारा लखनऊ के जश्न के लिए छोटा पड़ गया । गोमती भीशायद इस बदलते लखनऊ को देख में उस लखनऊ को तलाश कर है जो कभी उसके किनारे आबाद हुआ करता था।

अरसे पहले मिस एडेन गार्डेन ने छतर मंजिल और उसकी आस पास की इमारतो को देखकर कहा था '' इसे देखकर जुबैदा बेगम के फरहद बाघ की याद आती है लगता है अलिफ़ लैला में बयान बागे इरम ज़रूर इसी तरह का रहा होगा। '' पर आज हमारी धरोहरे जिस तरह ख़ुद को खड़ा किए हुए है उससे ये नहीं लगता की बहुत दिनों तक लखनऊ का वकार इस पर कायम रह पायेगा .

इस तरह से धीरे धीरे लखनऊ ख़ुद दूर होता जा रहा है लखनऊ से जब हमारे जश्न हमारी तहजीब , हमारे फनकार हमारी धरोहरे दूर हो जायेगी हमसे तो हम कैसे बचा पायेगे अपने इस महबूब शहर को । इस मौके पर उमर अंसारी साहेब की ये लाईनेएकदम वाजिब दिखाई पड़ती है ;

माना बहुत हसीं है माना बहत जवां है
यादो की सरज़मीन है ख्वाबो का आसमा है
बस्ती है नवाबो की शहरे सुखन वरां है
सब कुछ है फ़िर भी जैसे हर शय धुंआ धुंआ है
मै जिसको ढूढता हूँ वो लखनऊ कहाँ है
इक्के है अब न तांगे डोली न बग्घियाँ है
थे पहले आप वाले सब लोग अब कहाँ है
जिनको देखने को आँखे तरस रही है
मै जिसको ढूढता हूँ वो लखनऊ कहाँ है

Tuesday, November 10, 2009

तू जो नहीं तो कुछ भी नहीं है


राहें वहीं है, मंज़र वहीं है
तू जो नहीं तो कुछ भी नहीं है
ये वादियाँ जो खुलकर थी हंसती
ये राहें जो कदमो पर थी बीछ्ती
ये मौसम जो हम पे फ़िदा हो गया था
ये मंज़र ये आलम मेरा हो गया था
तेरे बाद सब ये सताने लगे है
ये मौसम ये मंज़र रूलाने लगे हैं
रास्ते मेरे पाँव मै चुभने लगे हैं
तेरे साथ मुझको ये अपने लगे हैं
चले तुम गए तो ये सब रो रहे हैं
खुशियों के सारे पहर खो रहे हैं
चला तू गया एक अहसास देकर
राहों में मंज़र में बस याद देकर
जाएँ जहाँ भी वो यादें बसी हैं
ये आँखें पुराने वो दिन ढूढती हैं
यहाँ साथ बैठे, हँसे हम कभी थे
ये मंज़र कभी अजनबी तो नही थे
तेरे बाद सब ये सताने लगे हैं
ये मंज़र बहुत अब रूलाने लगे हैं

Monday, November 9, 2009

जब तुम साथ थे


हमने गुज़ारे जो दिन साथ थे
वो ज़िन्दगी के हसीन लम्हात थे
अजनबी रास्तो पर थी मंजिल खड़ी
क्यूकि हर मोड़ पर तुम मेरे साथ थे
तुम थे बेहद हसीं न था तुम सा कोई
तुम तो जानम थे दिलबर थे दिलशाद थे
दूर होकर भी तुमसे नहीं दूर थे
ज़हनो दिल में तेरे ही ख़यालात थे
कब कहाँ और कैसे मिलेंगे तुम्हे
दिल में शामो शहर ये सवालात थे
जुदा हम हुए और फ़िर न मिले
बेवफा हम नही अपने हालत थे
ज़िन्दगी दर्दो गम और आँखे है नम
हम खुश थे ये तेरी ही सौगात थे

लखनऊ मेरे शहर


'' मैं तहेदिल से स्वीकारता हु की मुझे अपनी आँखे बार बार मलकर देखना पड़ता है की कही मैं किसी सपनो के शहर में तो नही हु , ये शहर न रोम है न अथेन्स न कुस्तुन्तुनिया , मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी ऐसा शहर नही देखा , जिसने मुझे इतना प्रभावित किया हो जीतना लखनऊ ने ।''

लन्दन के पर्यटक विलियम रसेल ने जब अरसे पहले ये अल्फाज़ कहे तो लखनऊ की खूबसूरती ने उनके दिलो दिमाग पर जो रंगीनियत बरपा की , उसके मोह मै वो बस इस हसीन शहर को निहारते रह गए थे ।

और यकीन मानिये आज भी लखनऊ की सरज़मी जिस तहजीब से दुनिया को रूबरू करा रही है उसमे शेखो की शेखी भी है तो बाबुओ का सादा जीवन भी है , जाबाजों की जाबाजी भी है तो नवाबो की नवाबियत भी है , घुघरूओं की झंकार भी है तो मजाज़ और नौशाद जैसे फनकार भी है । ये वो शहर है जहाँ आलिया बेगम ने हनुमान मन्दिर बनवाया तो राजा झऊलाल ने इमामबाडा और मस्जिद तामीर करवाई । ज़िन्दगी के जितने रंग लखनऊ की फिजाओं में घुले है , उनका सुरूर हर उस शख्स को खुमारी में डुबो देता है जो इस तहजीब से रूबरू होता है।

आज की बदलती हवाओं में लखनऊ की नायाब धरोहरें , उम्दा ज़बान , लज़ीज़ पकवान और बेमिसाल तहजीब जहाँ किसी को भी रिझाने का मद्दा रखती है तो बदलाव को जिस खूबसूरत अंदाज़ में लखनऊ में अपनी अदाओं में शामिल किया है , वो तरक्की की और बढ़ते जोशीले कदमो की इबारत लिख रहा है ।

हमारा ये महबूब शहर अपने हुस्न के हर नए रंग के साथ चेहरे पर मुस्कान बिखेर देता है फ़िर वो चाहे चौक की पुरानी गलियों में सवरता लखनऊ हो या नई कॉलोनियों में दिनों दिन पनपता लखनऊ, कबाब और सेवई पर मचलता लखनऊ हो या पिज्जा और चोमिन पर झपटता लखनऊ , चाशनी सी घुली उर्दू में बोलता लखनऊ हो या हिंगलिश को अपनी ज़बान में घोलता लखनऊ, मस्जिदों और मंदिरों में दुआ पढता लखनऊ हो या नए संगीत की धुनों पर थिरकता लखनऊ , अमीनाबाद और हजरतगंज में महकता लखनऊ हो या माल की नई रौशनी में दमकता लखनऊ , सियासत की गलियों में पेचीदा दाव खेलता लखनऊ हो या छत पर पतंग उडाता बेपरवाह लखनऊ , इतिहास के झरोखे से झांकता लखनऊ हो या मंजिल की दूरियों को लांघता नया लखनऊ।

तमाम बदलावों और ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद के बीच अपने दायरों को बढाता , फ्लाई ओवरों से भीढ़ तो ख़ुद में समेटता , मेट्रो के सपने संजोता , बग्घियों, ताँगों, बागों और तहजीब का ये शहर अपनी बेनजीर अदाओं से दुनिया को आज भी रीझा रहा है इसलिए लखनऊ को देखने वाला वाला हर शख्स मुस्कुरा रहा है।