
अब हर शख्स में उसको ही तलाश रहे हैं
जिसके साथ भी कभी हम उदास रहे हैं
ख़ुशी का लम्हा हो या हो ग़म का मौसम
हमारे हर जज़्बात में उसके ही एहसास रहे हैं
ग़मों से ज्यादा शिकायत नहीं रही हमको
ये ग़म ही तो हैं जो हमेशा वफादार रहे हैं
उसने मुडके न देखे कभी पैरो के निशां भी
तो कैसे कह दे की वो हमारे कभी यार रहे हैं
उलझनों से अब दिल को लगावट सी हो गई
वो और होंगे जो खुशियों के तलबगार रहे हैं

